कुत्ते को श्रीकृष्ण का रूप देने पर दर्ज FIR रद्द:हाईकोर्ट बोला- धार्मिक भावना आहत करने का इरादा नहीं, जन्माष्टमी पर व्हाट्सएप स्टेटस लगाया
- DSS Admin
- Jul 03, 2026
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने जन्माष्टमी पर अपने पालतू कुत्ते को भगवान श्रीकृष्ण की वेशभूषा पहनाकर उसकी फोटो व्हाट्सएप स्टेटस पर लगाने के मामले में दर्ज एफआईआर रद्द कर दी है। कोर्ट ने कहा कि महिला का किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का न तो इरादा था और न ही ऐसा कोई सबूत है कि उसने जानबूझकर यह काम किया। यह मामला होशियारपुर की रहने वाली एक महिला का है, जिसके खिलाफ सितंबर 2024 में तलवाड़ा थाने में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 298 के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी। अब हाईकोर्ट के जस्टिस सुभाष मेहला ने एफआईआर और पुलिस की अंतिम रिपोर्ट दोनों को रद्द कर दिया है। जन्माष्टमी पर लगाया था व्हाट्सएप स्टेटस शिकायत एक निजी शिकायतकर्ता ने दर्ज कराई थी, जिसने खुद को शिवसेना का युवा नेता बताया। शिकायत में आरोप लगाया गया कि महिला ने अपने पालतू कुत्ते को पीले रंग के वस्त्र, मुकुट और अन्य आभूषण पहनाकर भगवान श्रीकृष्ण जैसा रूप दिया और जन्माष्टमी के दिन उसकी तस्वीर अपने व्हाट्सएप स्टेटस पर लगाई। इससे हिंदू समाज की धार्मिक भावनाएं आहत हुईं। जांच के दौरान महिला, जो पेशे से बैंक मैनेजर है, ने पुलिस को बताया कि उसकी शादी को छह साल हो चुके हैं, लेकिन उसकी कोई संतान नहीं है। इसलिए वह अपने पालतू कुत्ते को बच्चे की तरह प्यार करती है। महिला ने कहा कि उसने जन्माष्टमी से दो-तीन दिन पहले कुत्ते को श्रीकृष्ण का मुकुट पहनाकर उसकी तस्वीर ली और उसे व्हाट्सएप स्टेटस पर लगा दिया। उसका किसी की भावनाएं आहत करने का कोई इरादा नहीं था। दो आधार पर हाईकोर्ट ने रद्द की FIR हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि इस मामले में BNS की धारा 298 के आवश्यक तत्व पूरे नहीं होते। पहला, अदालत ने कहा कि धारा 298 उन मामलों पर लागू होती है, जहां किसी पूजा स्थल या किसी पवित्र धार्मिक वस्तु को नुकसान पहुंचाया जाए या उसका अपमान किया जाए। इस मामले में कुत्ते को पहनाए गए मुकुट, पीले वस्त्र और अन्य आभूषण इस श्रेणी में नहीं आते। दूसरा, अदालत ने कहा कि महिला के खिलाफ धार्मिक भावनाओं का जानबूझकर अपमान करने का कोई इरादा (Mens Rea) साबित नहीं होता। केवल किसी की व्यक्तिगत भावना आहत होने से आपराधिक मामला नहीं बन जाता। सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण निर्णयों का उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति ने बिना दुर्भावना या जानबूझकर अपमान करने की मंशा के कोई कार्य किया है तो उसे आपराधिक अपराध नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी मामले में धार्मिक भावना आहत होने का आकलन किसी एक व्यक्ति की संवेदनशीलता से नहीं, बल्कि एक सामान्य और समझदार व्यक्ति के नजरिए से किया जाना चाहिए। अपने विस्तृत फैसले में जस्टिस सुभाष मेहला ने भगवद्गीता, महाभारत और रामचरितमानस का भी उल्लेख किया। अदालत ने गीता के उस श्लोक का हवाला दिया, जिसमें ज्ञानी व्यक्ति ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ते और अन्य जीवों को समान दृष्टि से देखता है। महाभारत में युधिष्ठिर और कुत्ते की कथा का भी उल्लेख किया गया, जिसमें युधिष्ठिर स्वर्ग के द्वार पर भी कुत्ते का साथ नहीं छोड़ते और बाद में वह कुत्ता धर्मराज का रूप धारण कर लेता है। फैसले में काल भैरव के वाहन के रूप में कुत्ते का भी जिक्र किया गया। साथ ही मिस्र, जापान और एजटेक सभ्यता में कुत्तों से जुड़े धार्मिक संदर्भों का उल्लेख करते हुए अदालत ने रामचरितमानस की चौपाई "जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी" का भी हवाला दिया। अभिव्यक्ति और धार्मिक स्वतंत्रता का भी संरक्षण हाईकोर्ट ने कहा कि महिला का यह कृत्य संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे में भी आता है। अदालत ने यह भी माना कि व्हाट्सएप स्टेटस सीमित लोगों तक ही दिखाई देता है, इसलिए इससे व्यापक स्तर पर धार्मिक भावनाएं भड़काने की मंशा भी नहीं दिखाई देती। महिला की ओर से यह भी दलील दी गई थी कि शिकायत राजनीतिक दुर्भावना से प्रेरित थी, क्योंकि शिकायतकर्ता स्वयं एक राजनीतिक दल का युवा नेता है। हालांकि हाईकोर्ट ने इस दावे पर कोई अलग टिप्पणी नहीं की। अदालत ने केवल यह माना कि इस मामले में अपराध के आवश्यक कानूनी तत्व मौजूद नहीं हैं, इसलिए एफआईआर को रद्द किया जाता है।

