हिसार : धान की फसल में पानी की बचत के लिए एक प्रोजेक्ट पर काम करेंगे एफएओ व एचएयू

कुलपति प्रो. बीआर कम्बोज परियोजना के बारे में अधिकारियों के साथ विचार विमर्श करते हुए


हिसार, 22 जून । हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय और संयुक्त राष्ट्र

के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) जीईएफ-7 फोलुर के तहत एक प्रोजेक्ट पर काम करेंगे।

इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य ब्रूइंग यीस्ट सैक्रोमाइसीस सेरेविसीए आधारित जैविक

बीज उपचार तकनीक के माध्यम से धान में जल उपयोग दक्षता को बढ़ाना तथा डीएसआर प्रणाली

को अधिक प्रभावी और किसानों के लिए अनुकूल बनाना है।

एचएयू कुलपति प्रो. बीआर कम्बोज ने साेमवार काे बताया कि हरियाणा में प्रचलित धान-गेहूं

फसल प्रणाली के कारण बढ़ते भूजल दोहन, मृदा क्षरण, प्रदूषण और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन

जैसी चुनौतियों के समाधान की दिशा में यह परियोजना बहुत लाभदायक सिद्ध होगी। परियोजना

के तहत धान की सीधी बिजाई (डीएसआर) को अधिक प्रभावी, टिकाऊ और किसान-अनुकूल बनाने के

लिए ब्रूइंग यीस्ट सैक्रोमाइसीज़ सेरेविसिए आधारित जैविक बीज उपचार तकनीक का परीक्षण

किया जाएगा।

उन्होंने बताया कि वर्तमान में धान की पारंपरिक रोपाई पद्धति अत्यधिक जल

और श्रम की मांग करती है, जबकि डीएसआर तकनीक जल संरक्षण और लागत में कमी के लिए एक

बेहतर विकल्प के रूप में उभर रही है। शोध के माध्यम से यह आंकलन किया जाएगा कि जैविक

बीज उपचार से धान के बीजों का अंकुरण, प्रारंभिक वृद्धि, पौधों की मजबूती तथा जल उपयोग

दक्षता किस प्रकार बेहतर हो सकती है।

कुलपति ने बताया कि यदि शोध के परिणाम सकारात्मक रहते हैं, तो यह तकनीक किसानों

के लिए कम लागत वाली, पर्यावरण-अनुकूल और आसानी से अपनाई जा सकने वाली नवाचार तकनीक

साबित होगी। इससे डीएसआर के व्यापक प्रसार को बल मिलेगा, भूजल संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा

तथा धान-गेहूं आधारित कृषि प्रणाली को अधिक टिकाऊ बनाया जा सकेगा। इस परियोजना के नोडल

अधिकारी मौलिक विज्ञान एवं मानविकी महाविद्यालय के अधिष्ठाता डॉ. राजेश गेरा जबकि परियोजना

के प्रधान अन्वेषक सूक्ष्म जीव विज्ञान विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. सीमा सांगवान

को बनाया गया है। इस अवसर पर अनुसंधान निदेशक डॉ. राजबीर गर्ग भी उपस्थित रहे।

   

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