आपातकाल अपनी सत्ता बचाने के लिए लिया गया राजनीतिक निर्णय थाः रामबहादुर राय
- DSS Admin
- Jun 27, 2026
नई दिल्ली, 27 जून (हि.स.)। आपातकाल से पहले बिहार में भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन का श्रीगणेश करने वाले वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय ने कहा है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने जय प्रकाश नारायण के सेना को सरकार का आदेश न मानने की सलाह के कारण नहीं, अपनी प्रधानमंत्री पद की कुर्सी बचाने के लिए देश में आपातकाल लगाया था। यह एक राजनीतिक निर्णय था।
आपातकाल के दौरान मीसा बंदी रहे तथा वर्तमान में आईजीएनसीए के अध्यक्ष रामबहादुर राय शुक्रवार को दिल्ली स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) में आपातकाल के खिलाफ संघर्ष करने वाले राय ‘प्रज्ञा प्रवाह’ और ‘जिज्ञासा’ की ओर से आपातकाल के 50 वर्ष पूरे होने के अवसर पर आयोजित 'संवाद : आपातकाल के सबक' कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। कार्यक्रम के दौरान वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक अजय सेतिया की पुस्तक 'आपातकाल : आंदोलन और विश्वासघात की अंतर्कथा' का लोकार्पण भी किया गया था। कार्यक्रम में आपातकाल के खिलाफ संघर्ष करने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के पूर्व वरिष्ठ प्रचारक एवं राजनीतिक-सामाजिक विचारक के. एन गोविंदाचार्य, राजकुमार भाटिया मुख्य वक्ता थे।
पद्म भूषण से सम्मानित रामबहादुर राय ने कहा, “25 जून 1975 को लगाया गया आपातकाल देश की आंतरिक सुरक्षा के कारण नहीं बल्कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय के खिलाफ आए फैसले और उच्चतम न्यायालय के अर्धनारीश्वर जैसे फैसले के कारण लगाया गया था। इसमें वह लोकसभा की सदस्य तो नहीं रही थी लेकिन उच्चतम न्यायालय के अंतिम फैसले तक प्रधानमंत्री पद पर रह सकती थी। इंदिरा गांधी ने देश पर आपातकाल लगा विपक्ष के नेताओं को गिरफ्तार कर लिया और संविधान संशोधन कर के उन कानूनों को ही बदल दिया, जिनके कारण उच्च न्यायालय का फैसला उनके खिलाफ आया था। इसलिए आपातकाल सिर्फ और सिर्फ अपनी सत्ता बचाने के लिए लिया गया राजनीतिक निर्णय था। उस समय जिन परिस्थितियों का हवाला देकर आपातकाल लगाया गया, वे वास्तविकता से परे थीं। रेलवे कर्मचारियों का आंदोलन समाप्ति की ओर था और जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चल रहा आंदोलन भी उस स्तर पर नहीं था कि उससे देश की आंतरिक सुरक्षा को खतरा उत्पन्न होता।”
इससे पहले अजय सेतिया ने कहा कि सिद्धार्थ शंकर रे ने शाह आयोग के सामने कबूल किया था कि आपातकाल का फैसला जय प्रकाश नारायण के भाषण से पहले लिया जा चुका था। उन्होंने कहा कि इंदिरा गांधी ने राष्ट्रपति के सामने झूठ बोला था, राष्ट्रपति इतने दब्बू निकले कि इंदिरा गांधी का एपीएस आरके धवन रात 11:00 बजे प्रधानमंत्री आवास में टाईप किए गए आपातकाल के आदेश पर दस्तखत करवाकर लाए थे।
सेतिया ने बताया कि आपातकाल भारतीय लोकतंत्र का सबसे कठिन दौर था। पुस्तक में आपातकाल के खिलाफ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं के सत्याग्रह तथा भूमिगत आंदोलन पर विस्तार से चर्चा की गई है जबकि अब तक प्रकाशित अन्य पुस्तकों में इन दिनों संगठनों की अनदेखी की गई थी। किताब में लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष करने वाले अनेक व्यक्तियों की भूमिका को ऐतिहासिक संदर्भों और तथ्यों के साथ प्रस्तुत किया गया है। इस पुस्तक में कई ऐसे दस्तावेज और तथ्य शामिल किए गए हैं, जो पहले व्यापक रूप से सामने नहीं आए थे।
डॉ. राजकुमार भाटिया ने कहा कि आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का ऐसा अध्याय है, जिसे नई पीढ़ी तक तथ्यात्मक रूप में पहुंचाना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए इतिहास से सीख लेना समय की आवश्यकता है। लोकतंत्र की रक्षा केवल संवैधानिक व्यवस्थाओं से नहीं, बल्कि नागरिकों की जागरूकता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से भी होती है। आपातकाल के दौरान लोकतांत्रिक अधिकारों पर लगे प्रतिबंधों को स्मरण करते हुए, उन्होंने लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत बनाए रखने का आह्वान किया।
इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में पत्रकारों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों एवं बुद्धिजीवियों ने भाग लिया और आपातकाल से जुड़े ऐतिहासिक अनुभवों तथा लोकतंत्र की चुनौतियों पर गंभीर विमर्श किया।
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