स्वामी राम स्वरूप जी ने बताया देवपूजा, संगतिकरण और दान से मिलता है ईश्वर का साक्षात्कार-स्वामी राम स्वरूप जी
- Neha Gupta
- May 30, 2026

कठुआ, 30 मई । वेद मन्दिर योल में आयोजित 78 दिवसीय चारों वेदों के यज्ञानुष्ठान के 49वें दिन स्वामी राम स्वरूप जी योगाचार्य ने सामवेद के मंत्र 388, 389 एवं 1683 के माध्यम से श्रद्धालुओं और जिज्ञासुओं को गहन आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान किया।
अपने प्रवचन में उन्होंने बताया कि परमेश्वर ही “ब्रह्मकृते” अर्थात वेदों के कर्ता हैं और समस्त ज्ञान के मूल स्रोत भी वही हैं। उन्होंने कहा कि चारों वेदों में सामवेद को विशेष स्थान प्राप्त है, इसलिए “बृहत साम गायत” के अनुसार सामवेद का गायन करना अत्यंत श्रेष्ठ माना गया है। स्वामी जी ने मंत्र 389 का उल्लेख करते हुए कहा कि परमेश्वर दानी पुरुषों को विशेष रूप से धन-सम्पत्ति प्रदान करते हैं।
वहीं मंत्र 1683 के आधार पर उन्होंने बताया कि जो व्यक्ति प्रिय वस्तुओं का दान करता है, वह अपने सभी पापों से मुक्त होकर जीवन में श्रेष्ठता प्राप्त करता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वेदों में तीन मुख्य तत्वोंकृ देवपूजा, संगतिकरण और दानकृ का विशेष महत्व है। देवपूजा का अर्थ है माता-पिता, वेद ज्ञानी, अतिथि और परमेश्वर की वेद मंत्रों द्वारा स्तुति और उपासना करना। संगतिकरण का आशय है वेदज्ञ विद्वानों का संग कर उनसे ज्ञान प्राप्त करना और उनकी सेवा करना। दान का तात्पर्य है यज्ञ में अथवा योग्य व्यक्ति को श्रद्धा से दान देना। स्वामी जी ने कहा कि जो मनुष्य इन तीनों सिद्धांतों का पालन करता है, वह शीघ्र ही अपने समस्त दुखों का नाश कर परमेश्वर को अपने हृदय में अनुभव कर सकता है। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और उन्होंने वेद ज्ञान के इस अमृतमय प्रवचन का लाभ उठाया।
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