बेहतर सुविधाओं के लिए कर रहे काम : एसएमओ

खिड़की पर पड़ी सिरिंज टूटा सिटिंग बैंच शौचालय के दरवाजे गायब कायाकल्प रैंकिंग के हालिया मूल्यांकन के बाद अस्पताल प्रशासन ने माना है कि कुछ बुनियादी कार्य जैसे शौचालयों का नवीनीकरण और दवाओं का बेहतर प्रबंधन अभी किया जाना बाकी है।वहीं, कायाकल्प रैकिंग में जालंधर के भोगपुर के भतनूरा आयुष्मान आरोग्य केंद्र नंबर बन रहा। जहां न स्ट्रेचर, न व्हील चेयर मिली । वहीं वर्कर का कहना था कि अधिकारियों ने हमसे झूठ बुलवाया है। अमृतसर में भी कुछ ऐसा ही होने की आशंका है। अस्पताल में फैली गंदगी ^हमारा मुख्य फोकस मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं देना और अस्पताल में स्वच्छता के उच्च मानकों को बनाए रखना है। सुविधाओं और सिस्टम में किए गए सुधारों का सकारात्मक असर कायाकल्प रैंकिंग में दिखाई दिया है। बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने की दिशा में लगातार काम कर रहे हैं। -डॉ. रजनीश, एसएमओ भास्कर न्यूज | अमृतसर केंद्र की कायाकल्प रैंकिंग में मार्च में सिविल अस्पताल को पंजाब में तीसरा स्थान मिला था मगर हकीकत में हालात बदत्तर हैं। भास्कर टीम मौके पर पहुंची तो स्वच्छता और मरीजों को बेहतर सुविधाएं देने के दावों की पोल खुली। अस्पताल में खुले में इस्तेमाल की गई सिरिंज पड़ी मिली जबकि हर कोने में गंदगी का आलम था। अस्पताल में मरीजों, विशेषकर गर्भवती महिलाओं और बच्चों के लिए बुनियादी सुविधाओं का कमी मिली । बच्चा वार्ड वाली मंजिल पर बने शौचालय पर दरवाजा तक नहीं है। फ्लश टंकियां पूरी तरह खराब हैं, जिससे महिला मरीजों को परेशानी झेलनी पड़ती है। गर्भवती महिलाओं के पूरे वार्ड के लिए महज एक बाथरूम है, जिसकी हालत बदतर है। महिलाओं को अपनी बारी के लिए घंटों कतार में खड़ा होना पड़ता है। बच्चा वार्ड और गर्भवती महिलाओं के वार्डों में मरीजों और गर्भवती महिलाओं के बैठने के लिए पर्याप्त बैंच तक नहीं हैं। यहां दाखिल मरीजों के अटेंडेंट के ठहरने या बैठने का कोई उचित प्रबंध नहीं है। तीमारदार वार्ड के बाहर कॉरिडोर में मजबूरन जमीन पर बैठकर खाना खाने को मजबूर हैं। अव्यवस्था का आलम यह है कि जनरल वार्ड में तीमारदार मरीजों के साथ उनके ही बेड पर बैठे दिखाई दिए। वहीं अस्पताल परिसर में लंबे समय से बिजली का एक बॉक्स खुला पड़ा है, जिसमें से नंगी तारें बाहर निकली हुई हैं। बारिश या नमी के दिनों में यहां बड़ा हादसा हो सकता है। अस्ताल का रख-रखाव: अस्पताल का मुख्य गेट, परिसर और सड़कें कितनी साफ हैं। वहां पुराना और बेकार कबाड़ जमा तो नहीं है। अंदरूनी सफाई: मरीजों के वार्ड, ऑपरेशन थिएटर और खासकर टॉयलेट कितने साफ हैं। पीने का पानी शुद्ध है या नहीं। कचरा प्रबंधन : मेडिकल कचरे (जैसे सुई, पट्टियां, दवाइयां) को नियम के अनुसार अलग-अलग रंग के डस्टबिन (लाल, पीला, नीला) में डाला जा रहा है या नहीं। इन्फेक्शन से बचाव: अस्पताल में बीमारी फैलने से रोकने के क्या इंतजाम हैं। डॉक्टर और स्टाफ इलाज के दौरान हाथ धोते हैं या नहीं और ग्लव्स-मास्क पहनते हैं या नहीं। अन्य जरूरी सेवाएं: मरीजों की चादरें रोज बदली और धोई जाती हैं या नहीं। अस्पताल की सुरक्षा और आग बुझाने के इंतजाम कैसे हैं। मरीजों को व्हील चेयर-स्ट्रेचर मिल रहा है या नहीं। स्टाफ की ट्रेनिंग और जागरूकता: सफाई को लेकर अस्पताल के स्टाफ को ट्रेनिंग दी गई है या नहीं। मरीजों को जागरूक करने के लिए पोस्टर लगे हैं या नहीं। अस्पताल के रिसेप्शन के पास एक खिड़की पर इस्तेमालशुदा सिरिंज पड़ी मिली। यही नहीं, पहली मंजिल पर स्थित बच्चा वार्ड के ठीक बाहर खिड़की के पास भी कई इस्तेमाल की गई सिरिंजें और गंदगी बिखरी दिखाई दीं। अस्पताल में रोजाना सैकड़ों बच्चे आते हैं। संक्रामक मरीजों पर इस्तेमाल की गई सिरिंज बच्चों को चुभने और संक्रमण फैलने का बड़ा खतरा बनी हुई हैं। यह प्रशासन के जैव-चिकित्सा कचरा प्रबंधन पर बड़ा सवाल है। अस्पताल में ज्यादातर व्हीलचेयर टूटी हुई हैं। वहीं मरीजों और उनके परिजनों का कहना है कि अस्पताल में न तो सफाई व्यवस्था है और न ही स्टाफ का व्यवहार संतोषजनक है। बता दें कि सिविल अस्पताल में प्रतिदिन ओपीडी में 1500 से अधिक मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं।

   

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