फोरम ने राज्य सरकार को सौंपा तीन सूत्री मांग पत्र

इटानगर, 19 जून (हि.स.)। अरुणाचल प्रदेश यूनाइटेड अरुणाचल पीपल्स फोरम ने मुख्यमंत्री पेमा खांडू को तीन सूत्रीय ज्ञापन सौंपा इसमें स्मार्ट प्रीपेड मीटर सिस्टम, इटानगर कैपिटल रीजन में वन भूमि को डी-रिजर्व करने और क्रा-दादी जिले में सड़क निर्माण परियोजना में कथित वित्तीय अनियमितताओं की जांच जैसे मुद्दों पर तुरंत दखल देने की मांग की गई है।

शुक्रवार को अरुणाचल प्रेस क्लब में आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए, फोरम के अध्यक्ष ख्योडा डैनियल ने कहा कि यह ज्ञापन मूल निवासियों के अधिकारों की रक्षा और शासन में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए है और चेतावनी दी कि अगर सरकार ज्ञापन मिलने के 14 दिनों के भीतर मांगों को पूरा नहीं करती है, तो फोरम अपनी मांगों के पूरा होने तक लोकतांत्रिक आंदोलन शुरू करेगा।

बिजली के मुद्दे पर, फोरम ने स्मार्ट प्रीपेड मीटर सिस्टम को तुरंत हटाने और पारंपरिक पोस्टपेड बिलिंग सिस्टम को बहाल करने की मांग की। इसने राज्य में घरेलू उपभोक्ताओं के लिए प्रति माह 1,000 यूनिट तक मुफ्त बिजली की भी मांग की।

डैनियल ने कहा कि अरुणाचल प्रदेश में जलविद्युत की अपार क्षमता होने के बावजूद, यहां के निवासियों को बिजली का अधिक खर्च उठाना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि राज्य के लोगों को यहां के प्रचुर प्राकृतिक संसाधनों का सीधा लाभ मिलना चाहिए।

उन्होंने आगे आरोप लगाया कि प्रीपेड मीटरिंग सिस्टम ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों, दिहाड़ी मजदूरों, पेंशनभोगियों और ग्रामीण निवासियों पर बुरा असर डाला है। उनके अनुसार, इस सिस्टम के कारण अपर्याप्त बैलेंस की वजह से बार-बार बिजली कटने, रिचार्ज से जुड़े अतिरिक्त शुल्क और बुजुर्गों तथा दूर-दराज के इलाकों में रहने वाले लोगों, जिनके पास डिजिटल पेमेंट की सुविधा कम है उनको को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

फोरम ने सरकार से आग्रह किया कि वह आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए बिजली सब्सिडी की एक विशेष नीति बनाए और यह सुनिश्चित करे कि जलविद्युत परियोजनाओं से मिलने वाले लाभ राज्य के लोगों तक पहुंचें।

डैनियल ने बताया कि आज की राजधानी इटानगर का बड़ा हिस्सा 1979 में असम फॉरेस्ट रेगुलेशन, 1891 के तहत डुरपांग रिज़र्व फ़ॉरेस्ट और वाइल्डलाइफ़ सैंक्चुअरी के दायरे में लाया गया था, जब अरुणाचल प्रदेश एक केंद्र शासित प्रदेश था। उन्होंने दावा किया कि रिज़र्व फ़ॉरेस्ट का दर्जा मिलने से ज़मीन के कब्ज़े का प्रमाणपत्र पाने, ज़मीन के आवंटन, बिल्डिंग बनाने की मंज़ूरी और बैंक लोन लेने में मुश्किलें आ रही हैं।

उन्होंने यह भी बताया कि सड़क, स्कूल, अस्पताल, सरकारी दफ़्तर और पानी की सप्लाई जैसी कई विकास परियोजनाओं में अक्सर फ़ॉरेस्ट क्लीयरेंस की ज़रूरतों के कारण देरी होती है। साथ ही, उन्होंने कहा कि कई आदिवासी गांवों और बस्तियों को बिना ठीक से बातचीत किए रिज़र्व फ़ॉरेस्ट इलाकों में शामिल कर लिया गया था और पारंपरिक ज़मीन के कब्ज़ों को रेगुलर करने की मांग की।

   

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